Thursday, February 18, 2016

VARANASI

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वाराणसी शहर का नाम यहां उपस्थित वरुणा नदी एवं अस्सी घाट दोनो के नाम से मिलकर बना है | इस शहर को और भी दूसरो नामो से भी जानते है काशी और बनारस, काशी इस शहर का प्रचीन नाम है| ये नागरी बाबा विश्वनाथ की नागरी कही जाती है बाबा विश्वनाथ यानी की शिव | शिव जो सबके संहारक माने जाते है लोगो का मानना है की जो लोग लोग काशी में अपने प्राण त्यागते है उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है उन्हें सभी जन्म-मरण  के बंधानो से छुटकारा|  बाबा विश्वनाथ का मंदिर गंगा नदी के दशाश्वमेध घाट के समीप है | ब्रह्मा जी ने इसका घाट का निर्माण शिव जी के स्वागत हेतु किया था। दूसरी कथा के अनुसार ब्रह्माजी ने यहाँ दस अश्वमेध यज्ञ भी किये थे। इसलिए इस घाट को दशाश्वमेध घाट कहते है| इस प्राचीन मंदिर में आदि शंकराचार्य, सन्त एकनाथ रामकृष्ण परमहंस, स्‍वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद, गोस्‍वामी तुलसीदास ये सभी दर्शन करने के लिए आ चुके है | इस प्रचीन नगर का उल्लेख स्कन्द पुराण, रामायण, महाभारत एवं प्राचीनतम वेद ऋग्वेद सहित कई हिन्दू ग्रन्थों में मिलता है। काशी का संबंध महाभारत काल से भी जुड़ा है| वर्णित एक कथा के अनुसार काशी नरेश की पुत्रियों के स्वयंवर पितामह भीष्म ने तीन पुत्रियों अंबा, अंबिका और अंबालिका का अपहरण किया था। इस अपहरण के परिणामस्वरूप काशी और हस्तिनापुर की शत्रुता हो गई। जिस कारण काशी नरेश महाभारत के युद्ध में पाण्डवों की तरफ से लड़े थे। 

भारत के कई कवि, लेखक, दार्शनिक, और संगीतज्ञ का संबंध वाराणसी में रहा हैं, जिनमें प्रमुख कबीरदास, मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, वल्लभाचार्य, रविदास, स्वामी रामानंद, पंडित रवि शंकर, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया, उस्ताद बिस्मिल्लाह खां, गिरिजा देवी आदि कुछ हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने हिन्दू धर्म का परम-पूज्य ग्रंथ रामचरितमानस यहीं लिखा था और यहाँ पर गोस्वामी तुलसीदास के नाम पर तुलसी मानस मंदिर है, दुर्गाकुंड के पास स्‍थित है|  गौतम बुद्ध को जब बोधगया में ज्ञान प्राप्त हुआ तो उन्होनें अपना प्रथम उपदेश यहीं निकट सारनाथ में दिया था। भारत के कई कवि, लेखक, दार्शनिक, और संगीतज्ञ का संबंध वाराणसी में रहा हैं, जिनमें प्रमुख कबीरदास, मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, वल्लभाचार्य, रविदास, स्वामी रामानंद, पंडित रवि शंकर, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया, उस्ताद बिस्मिल्लाह खां, गिरिजा देवी आदि कुछ हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने हिन्दू धर्म का परम-पूज्य ग्रंथ रामचरितमानस यहीं लिखा था और यहाँ पर गोस्वामी तुलसीदास के नाम पर तुलसी मानस मंदिर है, दुर्गाकुंड के पास स्‍थित है|  गौतम बुद्ध को जब बोधगया में ज्ञान प्राप्त हुआ तो उन्होनें अपना प्रथम उपदेश यहीं निकट ही सारनाथ में दिया था। वाराणसी हिन्दुओं एवं बौद्धों के अलावा जैन धर्म के अवलंबियों के लिये भी पवित्र तीर्थ है। इसे २३वें तीर्थंकर श्री पार्श्वनाथ का जन्मस्थान भी माना जाता है | वाराणसी को मंदिरो और घाटो की नगरी भी कहा जाता है, वाराणसी में १०० से भी अधिक घाट हैं | इस शहर के बारें में जितना कुछ कहा जाए कम है, परंतु इतना कहना अतिशयोक्ति नही की बहुत सारे किताबें और फिल्म इस शहर पर बन चुके है |

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